नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब बैंक ग्राहकों के खातों में जमा रकम और लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रखते हैं, तो संदिग्ध और असामान्य ट्रांजैक्शन को रोकने के लिए समय रहते कदम क्यों नहीं उठाते?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि बैंक या वित्तीय संस्थान की लापरवाही अथवा उचित जांच-पड़ताल में कमी के कारण ग्राहक डिजिटल अरेस्ट या साइबर ठगी का शिकार होता है, तो बैंक को पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई करनी चाहिए।
अदालत ने बैंकों की जवाबदेही तय करने पर दिया जोर
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने RBI के प्रस्तावित नियमों में बैंकों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता बताई।
अदालत ने निम्नलिखित कदमों पर जोर दिया:
- संदिग्ध और असामान्य बड़ी रकम के लेन-देन को तत्काल रोका जाए।
- ग्राहक से लेन-देन की वास्तविकता की पुष्टि की जाए।
- जरूरत पड़ने पर स्थानीय पुलिस को सूचना दी जाए।
- बैंक की लापरवाही साबित होने पर पीड़ित को नुकसान के बराबर मुआवजा मिले।
- ठगी में मिलीभगत करने वाले बैंक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
कितने बड़े स्तर पर हो रही है ठगी?
अदालत में पेश आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के शुरुआती आठ महीनों में डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी 21,928 शिकायतों में 647 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी दर्ज हुई।
RBI को नियमों पर जवाब देने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने RBI के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देशों की समीक्षा करने की बात कही है। इन नियमों को 30 नवंबर 2026 तक अधिसूचित और 31 दिसंबर तक लागू करने की योजना बताई गई है। Bar and Bench – Indian Legal news+1
महत्वपूर्ण बात: अदालत ने हर साइबर ठगी के मामले में स्वतः बैंक को जिम्मेदार नहीं ठहराया है। बैंक की उचित जांच-पड़ताल में विफलता के कारण ठगी होने की पुष्टि होने पर मुआवजे की व्यवस्था अनिवार्य करने पर जोर दिया है।
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